meri aawaz
Saturday, July 24, 2010
कविता
कविता
ये शहर है कि जान लेने पर उतारु है....
और हम है कि जान दे भी नहीं सकते
जिंदगी हमसे रोज मजाक करती है....
आज लगता है कि हम मर जाएंगे
अब लगता है कि मर भी नहीं सकते।।
विधु शेखर उपाध्याय।
इंडिया न्यूज़
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