आज़ादी
लड़ों उस आजादी के लिए
जो तुम्हारे भीतर बेवा की तरह....
सफेद साड़ी में डरी बैठी है......
जो सच्चाई देखने से डरती है...
सच्चाई बोलने से डरती है-
और सच्चाई सुनने से डरती है......
जो फैसले के समय समाज के डर से समझौता करना पसंद करती है...
क्योंकि उसके जुबान को खून और मांस से भीगी रोटी खाने की चाट लग गई है....
उसे चमड़े के बिस्तर पर सफेद चमड़ी के साथ सोने की आदत पड़ गई है...
उसे लोहे की काली मोटी हथकड़ियों से डर लगता है...
क्योंकि उसके भीतर का इंसान मर चुका है......
जो किसी की आह की परवाह नहीं करता....
जो किसी मज़लूम असहाय की तरफ
अपनी गर्दन नीचीं नहीं करता....
जो जानना नहीं चाहता कि उसकी आज़ादी....
क्या है......?
जिसके लिए आज़ादी के तीन अक्षर......
एक बेहूदा भद्दा मजाक है............
लेखक- विधु शेखर उपाध्याय,....इंडिया न्यूज़ ......
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