Saturday, August 8, 2009

चुभन

दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है
हजारों कोशिशें करता हूं भुलाने की मगर
मेरा जमीर रह-रहकर सवाल करता है,

धंसा खंजर गवाही देता है
मसला कत्ल का है दिखाई देता है
मगर साबित कौन करेगा
साजिशों के शिकंजों से लड़कर सच को
आज भी सच भी डरा-डरा दिखाई देता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है ,

पीटती हैं लोहे की छड़ें मेरे बदन को
एक चीखता शोर कल से चौराहे पर सुनाई देता है
मैं भागता हूं रात के पिछले पहर से ही बदहवास होकर
हर शख्स का चेहरा मुझे कातिल दिखाई देता है
सिसकती है जिंदगी कारखानों की गिरफ्त में
सड़क के फुटपाथ पर मजदूर नीलाम होता है
पूछता हूं जब तमाशबीनों की भीड़ से वक्त के बारुद का पता
तो हर हादसा मुझे श्मशान का गुमनाम पता देता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है,

गर्म है पत्थर पीरों की दरगाहों पर
पैगम्बर के खून में उबाल आता है
रोती है चादर पड़ी मजारों पर
जब नबी को जिंदा जलाया जाता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है

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