पाप के ही मूल से पुण्य की उत्पति होती है जिसका उदाहरण पौणाणिक कथाओं में हिरणकश्यप के पुत्र पहलाद के रूप में देखा जा सकता है। रावण के भाई विभिषण का भी उत्पत्ति पाप के ही गर्भ से ही हुई थी... ये प्राकृतिक लीलाये हमारे सामने इसी तरह अपनी शक्ति का प्रमाण देती है। ताकि संसार के लोगो को जीने की प्रेरणा मिल सके मगर यह कहना की कल बल छल का प्रयोग केवल पृथ्वी पर ही होता है यह कहना ग़लत होगा। यह देवलोक में भी चलता रहा है। सत्ता और सिंहासन का लोभ देवातावो को भी रहा है। इन्द्र की समय समय पर गोवर्धन पूजा को लेकर बेचैनी का बढ़ जाना...तो कभी अर्जुन की जिन्दगी के लिए कर्ण से भी कपट करना....बावजूद इसके उनकी आत्मा को जरा भी संकोच नही होता था। देवलोक की शक्तियों को समझ पाना इतना आदमी के लिए आसन कहाँ है..... फिर भी एक बात जो दोनों सामान्य रूप से देखी जा सकती है वह यह है कि शासन करने के लिए राजा किसी भी हद तक जा सकता है। चाहे इन्द्र को अपनी बेटी ही शुक्राचार्य को क्यों ही न देनी पड़े।
माना यह जाता है की अफीम और मदिरा से भी खतरनाक नशा सत्ता और सौन्दर्य का होता है जिसके लिए वह रिश्तों का भी ख्याल नही करता है।
वर्त्तमान में सारे उदाहरण में कई चेहरे आ जाते हैं। चारा घोटाले के सिरमौर लालू हो या बेगुनाहों पर अयोध्या में गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह..... ये आज भी आपको सत्ता के गलियारे में बैठ कर लोकतंत्र के समर्थन में सलाह देते नजर आएंगे.....
विधु शेखर उपाध्याय।
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