खौफ है दहशत है चीख है
अब हादसा कितना करीब है
मौत सरेयाम घुमती है शहर में
कोई बेहोस है तो किसी के जिस्म पर खुनी कमीज है,
मै तमासा बनकर घूमता हु लोगो से पूछता हु,
मरने वाले बोलते नही और हत्यारे अपना मुह खोलते नही
मै जनता हु कातिलो को अच्छी तरह पहचानता हु
मगर बोल नही सकता क्योकि राज सरकार का है और डंडा कानून का है
जिसके बोलने से हड़कंप मच जाएगा अभी तो केवल बस्ती जली है बाद में पुरा सहर शोलो से दहक जाएगा।
इसलिए अब नही बोलता हूँ कातिलो के राज नही खोलता हूँ
दुनिया चाहे मुझे नामर्द समजे या कायर क्या फर्क पड़ता है
कमसे कम मेरे न बोलने से हजारो घर तो बचता है
गूंगी सरकार है इसे गूंगा समाज चाहिए
बोलने वालो को पहले अपने हाथो से अपना घर फूक देना चाहिए
छिनैती डकैती अपहरण आतंकवाद बनाम समाजवाद यही सचाई है
जहा मौत सस्ती है मगर गिधो के आखों में न रहम है न दुहाई है,,,,,,,,
विधु शेखर उपाध्याय ज़मानिया
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