Sunday, May 17, 2009
मेरी आवाज़
गावों की बदहाली देख कर कोई भी यह अंदाजा नही लगा सकता है की हम वैश्विकरण कारन के उस युग में पहुच चुके है के जहाँ जीवन प्रयोगशालाओ में जन्म ले रहा है। सब कुछ सम्भव है आदमी को कुत्ता बनाया जा सकता है कुते को आदमी। परन्तु भुखमरी और गरबी दूर करने के जितने भी उपाय होते है वह उतनी तेज रफ्तार से कहाँ पुरे होते है जीतनी तेज भ्रस्ताचार। कभी गाँधी ने कभी कहा था की यदि भारत को जानना ही तो गावो में जावो जहाँ तुम्हे भारत की सभ्यता, संस्कृति, इमानदारी दिखाई देगी। उस वक्त उन्होंने काया सोच कर कहा था समझ में नही आता। क्या उन्हें सभ्यता, संस्कृति में उपेछित कुंठित गाव दिखाई नही दे रहा, या वे भारत का सामूहिक मजाक उड़ना चाहते थे। हम जानते है की भारत की अर्थव्यवस्ता में ७० फीसदी योगदान कृषि का है , जिसमे किसानो की भागीदारी है ,lekin जिसको किसान कहा जाता है वो मरनेमजबूर है। आज वो आत्महत्या करने पर विवश हो चुका है। सरकारी नीतिया अधिकारियो की फायलों में से निकालने से पहले ही दम तोड़ देती है। विगत कुछ वर्षो का आकडा देखा जाए तो हम कह सकते है की पुरा दोष न तो सरकार का है न तो हमारा दोष है तो सिर्फ गाव की किस्मत का जिसकीकिस्मत में सुख मयस्सर ही नही है बापू वाला गाव बापू की तरह सामूहिक अवसरों पर केवल यद् किया जाता है और कुछ नही जो जियागो सोती और लागोती में यही उसकी किस्मत है। जिसकी लाटी आए दिन तोड़ कर फेक दी जाती है जिसका बचपन कूड़े बिनता हुवा बुदापे में चला जाता है। प्रेमचंद्र का हामिद दादी के चिमटे के लिये अपना बचपन गिरवी रख देता है। उसके बाद भी सरकार पर कोई फर्क नही है क्योकि कर्म से रोटी खरीदी जा सकती है दूध मलाई तो किस्मत से मिलाती है जो गाव की कुंडली में आंशिक रूप से ही दिही पड़ते है, पुरी तरह से नही।
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