Saturday, July 24, 2010

कविता

कविता
ये शहर है कि जान लेने पर उतारु है....
और हम है कि जान दे भी नहीं सकते
जिंदगी हमसे रोज मजाक करती है....
आज लगता है कि हम मर जाएंगे
अब लगता है कि मर भी नहीं सकते।।
विधु शेखर उपाध्याय।
इंडिया न्यूज़

कश्मकश

हादसा किस मोड़ पर सामने आकर खड़ा हो जाएगा कुछ कहा नहीं जा सकता। हादसे की पहले से जानकारी कर ली जाए ऐसा भी मुमकिन नहीं। हम अपनी जिंदगी कुछ ऐसे ही जीते है....आगे का सच क्या है ये मालूम करना बहुत ही कठिन है। बहुत सी जिंदगियां इसी भुलावे में जीती है, और एक दिन हादसे का शिकार हो जाती है। लेकिन क्या इसे बदला जा सकता है...क्या इसे मोड़ा जा सकता है....क्या हम हादसे की नब्ज पर अपनी उंगली रख सकते हैं, बहुत सारे ऐसे वाहियात खयालात मन में आते जिनका समाधान ढूढना बहुत ही मुश्किल होता है.....आज हम कुछ ऐसी ही दौर में जी रहे है...जहां आज तो दिखाई देता है मगर कल क्या होगा...नहीं मालूम....जीते की कशिश कहे जा मजबूरी हम सबकुछ जानकर भी चुपचाप जीने के आदी होते जा रहे है....लेकिन चुपचाप जीने से खतरों को टाला नहीं जा सकता। खतरा तो सामने खड़ा है, हम केवल अपनी आंखे बंद कर लिए हैं। मैने भी इस खतरे को अब महसूस कर रहा हूं....प्रजातंत्र में अगर कोई डर-डर के जीता है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा। लेकिन ये डर है क्या....क्या ये डर स्वंय का बनाया हुआ है....या हम जिस समाज, वातावरण में रहते है उससे मिला है....

Friday, October 9, 2009

आज़ादी
लड़ों उस आजादी के लिए
जो तुम्हारे भीतर बेवा की तरह....
सफेद साड़ी में डरी बैठी है......
जो सच्चाई देखने से डरती है...
सच्चाई बोलने से डरती है-
और सच्चाई सुनने से डरती है......
जो फैसले के समय समाज के डर से समझौता करना पसंद करती है...
क्योंकि उसके जुबान को खून और मांस से भीगी रोटी खाने की चाट लग गई है....
उसे चमड़े के बिस्तर पर सफेद चमड़ी के साथ सोने की आदत पड़ गई है...
उसे लोहे की काली मोटी हथकड़ियों से डर लगता है...
क्योंकि उसके भीतर का इंसान मर चुका है......
जो किसी की आह की परवाह नहीं करता....
जो किसी मज़लूम असहाय की तरफ
अपनी गर्दन नीचीं नहीं करता....
जो जानना नहीं चाहता कि उसकी आज़ादी....
क्या है......?
जिसके लिए आज़ादी के तीन अक्षर......
एक बेहूदा भद्दा मजाक है............
लेखक- विधु शेखर उपाध्याय,....इंडिया न्यूज़ ......

Wednesday, October 7, 2009

आज़ादी


लड़ों उस लड़ाई के लिए ...

जो तुम्होरे भीतर बेवा की तरह सफेद साड़ी में डरी बैठी है...

जो सच्चाई सुनना नहीं ...

चाहती सच्चाई देखना नहीं चाहती...

और सच्चाई बोलना नहीं चाहती ...

जो फैसले के समय समाज के डर से...

समझौता करना पसंद करती है...

क्योंकि उसके जुबान को खून और मांस ...

से भीगी रोटी खाने की आदत पड़ गई है...

उसे चमड़े के बिस्तर .....

पर सफेद चमड़ी के साथ सोने की आदत पड़ गई है...

उसे लोहे की काली मोटी हथकड़ियों से डर लगता है.....

क्योंकि उसके भीतर का इंसान मर चुका है.....

जिसे सूरज की सफेद गर्मी में चलने के बजाय..

अलसाई बेहयाई ....क्लबों की शराबी महकती रातों में लड़खड़ाना पसंद है...

जिसे किसी की आह की कोई परवाह नहीं है...

जो किसी गरीब मजलूम असहाय की तरफ अपनी गर्दन नीचीं नहीं करना चाहता......

जो जानना नहीं चाहता कि उसकी आजादी क्या है...

जिसके लिए आजादी के तीन अक्षर एक बेहूदा भद्दा मज़ाक है.......

लेखकः विधु शेखर उपाध्याय.......इंडिया न्यूज़ 9990214820




Tuesday, October 6, 2009

लड़ो उस लड़ाई के लिए जो तुम्हारे भीतर

बेवा की तरह सफेद साड़ी में डरी बैठी है

जो फैसले के समय समाज के डर से समझौता करना पसंद करती है

Saturday, August 8, 2009

चुभन

दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है
हजारों कोशिशें करता हूं भुलाने की मगर
मेरा जमीर रह-रहकर सवाल करता है,

धंसा खंजर गवाही देता है
मसला कत्ल का है दिखाई देता है
मगर साबित कौन करेगा
साजिशों के शिकंजों से लड़कर सच को
आज भी सच भी डरा-डरा दिखाई देता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है ,

पीटती हैं लोहे की छड़ें मेरे बदन को
एक चीखता शोर कल से चौराहे पर सुनाई देता है
मैं भागता हूं रात के पिछले पहर से ही बदहवास होकर
हर शख्स का चेहरा मुझे कातिल दिखाई देता है
सिसकती है जिंदगी कारखानों की गिरफ्त में
सड़क के फुटपाथ पर मजदूर नीलाम होता है
पूछता हूं जब तमाशबीनों की भीड़ से वक्त के बारुद का पता
तो हर हादसा मुझे श्मशान का गुमनाम पता देता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है,

गर्म है पत्थर पीरों की दरगाहों पर
पैगम्बर के खून में उबाल आता है
रोती है चादर पड़ी मजारों पर
जब नबी को जिंदा जलाया जाता है
दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरे
वक्त फिर भी मजाक करता है